ভবানীপ্রসাদ ভট্টাচার্য্য, ফিচার রাইটার, দুর্গাপুরঃ  বর্তমান  পশ্চিম বর্ধমান  জেলার  কাঁকসা  ব্লকের  আমলাজোড়া  গ্রাম  পঞ্চায়েতের  ছোট্ট একটি  সাদামাঠা  গ্রাম  ন'পাড়া! পূর্বে  সম্ভবতঃ  গ্রামটি  নয়টি  পাড়া  নিয়ে  গড়ে  উঠেছিল  বা  নিকটবর্তী  ধোবাঘাটা গ্রাম  থেকে  কিছু  মানুষ  নতুন  পাড়া  তৈরী  করে  বসতি  স্হাপন  করেছিলেন! তাই  গ্রামটি  প্রথমে  নতুন  বা  নব  পাড়া  থেকে  ন'পাড়া  নামে  পরিচিতি  পেয়েছে!
           দামোদর  নদের  উত্তরে  নদের  কোল  ঘেঁসে  গড়ে  ওঠা  গ্রামটি  সাধারন  আর  পাঁচটি  গ্রামের  মতোই! বিশেষ  কোন  বৈশিষ্ঠ  চোখে  পড়ে  না! গ্রামে  ব্রাক্ষ্মন  সহ  হিন্দুদের  সব  জাতির  বাস  আছে! গ্রামের  অধিকাংশ  মানুষের  জীবিকা  কৃষি  হলেও  একটা  বড়  অংশ  কলকারখানা  এবং  সরকারী  অফিসে  চাকরী  করেন! গ্রামের  বহু  মানুষ  চাকরী  সূত্রে  বাইরে  থাকেও  পুজো পার্বন  বা  বিশেষ  অনুষ্ঠানে  গ্রামে  আসেন!
                এই  গ্রামের  বৈশিষ্ঠ  মুখার্জী বাড়ীর  কালীপুজো! আজ  থেকে  ১৪৬  বছর  পূর্বে  ১৮৭৩ সালে  এই  গ্রামের  রামধন  মুখোপাধ্যায়  এই  কালীপুজার  পত্তন  করেন! কিন্তু  কয়েক  বছর  ধুমধাম  সহকারে  মায়ের  পুজো  হলেও  কোন  অঞ্জাত  কারনে  পুজো  বন্ধ  হয়ে  যায়!
     

 বহু বছর পর  আবার  ১৯২২  সালে  নতুন  করে  মুখার্জী বাড়ীতে  মা  কালীর  পুজা  শুরু  হয়! এই  পুজা  শুরু  হওয়ার  পশ্চাতে  আছে  একটি  বিশেষ  ঘটনা! এই  পরিবারের  ধরনীধর  মুখার্জী  নামে  এক  যুবকের  হঠাৎ  হেচকী  শুরু  হয়! কবিরাজ, ডাক্তার, বদ্যি  দেখিয়েও  কোন  লাভ  হয়  না, হেঁচকি  কিছুতেই  থামে  না! তখন পার্শ্ববর্তী  ধোবাঘাটা  গ্রামের  এক  ব্যক্তি  নিদান  দেন, ডাক্তার  বদ্যিতে  কোন  কাজ  হবে  না! কালীপুজা  করলেই  এই  রোগ  সেরে  যাবে!! সেদিন  অমাবশ্যা না  থাকলেও  কৃষ্নপক্ষ  ছিল! সেদিনই  তালপাতার  ছাউনিতে  ঘটস্হাপন  করে  মা কালীর পুজোর পর  ছাগ  বলি  দেওয়ার পরই  আশ্চর্য্যজনক ভাবে  ধরনীধরের  হেঁচকি  বন্ধ  হয়ে গেল! দ্রুত  তিনি  সুস্হ হয়ে  উঠলেন!সেই  বছর  থেকে  নব  উদ্যোমে  পুজা  শুরু  হ'লো! মায়ের  মন্দির  নির্মিত  মাটির  দেওয়ালে  তালপাতার  ছাউনি  দিয়ে! কিন্তু  কয়েক বছর  পর  দামোদরের  ভয়ঙ্কর  বন্যায়  সমস্ত  ঘর বাড়ী  ভেসে  যাওয়ায়  মুখার্জী  পরিবার  ডাঙাতে  নিজেদের  বাড়ী  বানানোর  সাথে  মা কালীর  পাকা  মন্দির  নির্মান  করা  হলো!
            সেই  সময়  থেকে  ধুমধাম  করে  প্রতি বছর  কার্তিকী  অমাবশ্যায়  মা  কালীর  পুজা  হয়ে  আসছে! কিন্তু মুখার্জী  পরিবারের  বেশীরভাগ  সদস্য  কর্মসূত্রে  গ্রামের  বাইরে  থাকায়  ১৯৯৯  সালে অঘটন  ঘটে  এই  পরিবারের  কেউ  উদ্যোগ  না  নেওয়ায়  প্রতিমা  নির্মান  হয়নি, হয়নি  মন্দিরের  সামনে  অস্হায়ী  নাটমঞ্চ! গ্রামের  সবাই  বুঝলো মুখার্জী  পরিবারের  মধ্যে  মায়ের  পুজার  পালা  নিয়ে  দ্বন্দ্বের  কারনে  এ বছর  পুজো  বন্ধ  হয়ে  গেল!
           নানু  মালাকার  প্রতি বছরের মতো  পুজোর  দিন  সকালে  মাকে  ডাক সাজে  সজ্জিত  করতে  এসে  দেখেন ! প্রতিমা  নেই, মায়ের  বেদীতে  বিগত  বছরের  প্রতিমার  কাঠামো ( কথ্য  ভাষায়  ম্যাড়)! অগত্যা  ডাকসাজ  নিয়ে  তিনি  নিজগৃহ  অভিমুখে  রওনা  দিলেন!
             কিন্তু  তিনি  এক  অলৌকিক  ঘটনার  সন্মুখীন  হলেন! পথে  কেটেন  গ্রামের  কালী  মন্দিরের  সামনে  লালপাড়  শাড়ী  পরিহিতা  একটি  বালিকা মালাকারের  সামনে  এসে  জিঞ্জাসা  করেন ," মা কে  না  সাজিয়েই  চলে  যাচ্ছো? তোমার  সাহস  তো  কম  নয় "! চকমে  উঠলেন  চানু  মালাকার, তাঁর  মনে  হ'লো এই  মেয়ে  তাঁর  খুব  চেনা....হঠাৎ  মনে  পড়ে  গেল  এতো  মায়ের  মুখ...ফিরে  তাকিয়ে  দেখেন  বলিকা  মূহুতেই  অদৃশ্য  হয়ে  গেছে! তিনি  আবার  ছুটতে  ছুটতে  ন'পাড়ার  মুখার্জীবাড়ীর  কালী মন্দিরে  ফিরে  এসে  মা  কালীর  কাঠামো  ডাকের  সাজে  সজ্জিত  করলেন! এই  ঘটনা  শুনে  প্রমাদ  গনলেন  মুখার্জী  পরিবার! দ্রুত  পুজার  যোগাড়  করে  সন্ধ্যারাতেই  মায়ের  পুজা  সম্পন্ন  হ'ল!
           এরপর  আর  মায়ের  পুজা ছেদ  পড়েনি!মায়ের  পুজা  শুরু  হয়  মধ্য রাতে! বারি  আনা  হয়  দামোদর  নদ  থেকে!মুখার্জী  পরিবারের  তিন  শরীকের  দেওয়া তিনটি  ছাগ  প্রথম  বলি  দেওয়া  হয়, পরে  ভক্তদের  মানতের  ছাগ  বলি  হয়! এরপর  মায়ের  ভোগ  দেওয়া  হয়, খেঁচুড়ি, পঞ্চব্যাঞ্জন,ভাজা,লুচি, সুজির  পায়েস আর  প্রথম  বলি  হওয়া  পাঁঠার  টেংরির  মাংস! এর  প্রসাদ  পান  বাড়ীর  সদস্য, এবং ভক্তরা!
            পরের  দিন  ৩০০/৪০০ জনের  পংতিভোজের  আয়োজন  করা  হয়! প্রতিমা  নিরঞ্জন  হয়  দামোদর  নদে! মুখার্জীবাড়ীর  কালীপুজোকে  কেন্দ্র  করে  মাতে  সারা  গ্রাম! পারিবারিক পুজো  হলেও  অংশ  নেয়  পুরো  গ্রায়! পুজো  সার্ব্বজনীনরূপ  পায়! বিসর্জনের  রাতে  সকলেই  বিষাদগ্রস্হ  মনে  মায়ের  কাছে  আকূল  প্রর্থনা  জানায়  আবার  এসো  মা!


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